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दहेज रोकने के नाम पर पंचायत ने तय की सोना-चांदी की सीमा, उठे कानूनी सवाल

पलवल, 7 सितंबर 2026 | होडल न्यूज़ संवाददाता

मंडकोला में आयोजित 52 पालों की महापंचायत में विवाह समारोहों में फिजूलखर्ची और दहेज प्रथा को रोकने के उद्देश्य से कई सामाजिक फैसले लिए गए। हालांकि, पंचायत द्वारा लगन, भात और कन्यादान में सोना-चांदी तथा अन्य सामान की अधिकतम मात्रा निर्धारित किए जाने के बाद अब इस फैसले की कानूनी वैधता को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार पंचायत के फैसले में भात में अधिकतम एक तोला सोना और 100 ग्राम चांदी तथा कन्यादान में अधिकतम दो तोले सोना और 100 ग्राम चांदी देने की सीमा बताई गई है। इसके अलावा नकद राशि, कपड़े, बर्तन और अन्य सामान को लेकर भी सीमाएं निर्धारित की गई हैं।

कानूनी जानकारों के अनुसार दहेज निषेध अधिनियम, 1961 में दहेज की कोई ऐसी वैध मात्रा निर्धारित नहीं है कि एक निश्चित मात्रा तक सोना या चांदी देना कानूनी माना जाए। यदि किसी वस्तु को विवाह के संबंध में मांग या अनिवार्य रूप से दिए जाने वाले सामान के रूप में निर्धारित किया जाता है, तो उसकी मात्रा कम कर देने मात्र से वह स्वतः वैध नहीं हो जाती।

यही वजह है कि पंचायत के इस फैसले पर सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि उद्देश्य दहेज को समाप्त करना है, तो फिर सोना-चांदी और अन्य सामान की सीमा निर्धारित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी।

हालांकि, केवल पंचायत द्वारा सामाजिक नियम घोषित किए जाने से अपने-आप किसी व्यक्ति पर दहेज अपराध सिद्ध नहीं हो जाता। कानूनी स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि ये वस्तुएं स्वेच्छा से दिए जाने वाले पारंपरिक उपहार हैं या किसी मांग, दबाव अथवा विवाह की शर्त के रूप में निर्धारित की गई हैं।

लोगों के बीच भी फैसले को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है। एक वर्ग का कहना है कि पंचायत का उद्देश्य विवाह में बढ़ते खर्च को रोकना और सामाजिक सुधार करना है। वहीं दूसरे वर्ग का सवाल है कि दहेज समाप्त करने के बजाय सोना-चांदी की अधिकतम मात्रा तय करना कहीं दहेज को सीमित करने जैसा तो नहीं है।

कानूनी विशेषज्ञों की राय का सार यह है कि सामाजिक पंचायतें लोगों से सादगी अपनाने की अपील कर सकती हैं, लेकिन किसी भी सामाजिक निर्णय को देश के लागू कानून से ऊपर नहीं रखा जा सकता। यदि किसी फैसले को दबाव, धमकी, जुर्माने या सामाजिक बहिष्कार के माध्यम से अनिवार्य रूप से लागू किया जाता है, तो उसकी वैधानिकता अलग से जांच का विषय बन सकती है।

अब निगाह प्रशासन पर है कि पंचायत के इन फैसलों को किस रूप में देखा जाता है और क्या इस मामले में कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आता है।

मुख्य सवाल:
दहेज समाप्त करने की बात करने वाली पंचायत क्या विवाह में दिए जाने वाले सोने-चांदी की अधिकतम सीमा स्वयं निर्धारित कर सकती है? इस सवाल पर प्रशासन और कानून विशेषज्ञों की स्पष्ट स्थिति का इंतजार है।